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REBORN WITH A HOPE

  • JWB Post
  •  April 26, 2014

 

मैं मिथलेश त्यागी पेशे से अध्यापिका, जीवन के लगभग 49 सावन व पतझड़ देखने के बाद उन सभी अविस्मरणीय अनुभवों को आपके समक्ष रखना चाहूँगी जिन्होने मेरे जीवन को पूर्णतः एक नई दिशा दी। मेरा मानना है कि जीवन भले ही संघर्षो से भरा हो किन्तु आपकी सकारात्मक सोच आपकी खुशियों का मापदंड बन सकती है।

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मेरा विवाह दिल्ली के एक अत्यन्त प्रतिष्ठित परिवार में हुआ। मूल रूप से हर साधारण लड़की की तरह मैं भी इस विवाह से बहुत खुश थी क्योंकि यह मेरे जीवन की एक नई शुरूआत थी। परन्तु शायद वह परिवार मेरे आगमन से इतना खुश नहीं था। घर में आए किसी भी नए सदस्य को मेरे परिवार वाले हृदय से स्वीकार नहीं कर पाते थे और यही मेरे साथ भी हुआ। विवाह के 11 महीने बाद मैने एक बच्ची को जन्म दिया परन्तु जिस घर में, मैं अब तक अजनबी थी तो भला मेरी बच्ची वहाँ कैसे अपनापन महसूस कर पाती? चाहकर भी मेरे पति के हृदय में उनकी माँ की कठोर टिप्पणियों ने हमारे लिए कभी कोई पे्रम भाव उत्पन्न नहीं होने दिया। इसके विपरीत परिस्थितियाँ इतनी विषम हो गई कि उस घर में मैं अपनी बच्ची के साथ असुरक्षित महसूस करने लगी और अंततः मुझे वह घर छोड़ना पड़ा।

इस फैसले के बाद मुझे बहुत सी आलोचनाएं सुनने को मिली कि अकेले रहना आसान नहीं है। बिना पुरूष की छाया मे औरत समाज में रह नही सकती। बच्ची और खुद के लिए पैसे कहां से लाओगी? इन सभी नकारात्मक विचारधाराओं को सकारात्मक बनाने का दृढ़ निश्चय लिये, मैंने यह ठान लिया कि मुझे मेरी बच्ची को इस दुनिया की हर खुशी देनी है। मैंने नौकरी पाने के लिए प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी शुरू कर दी। बच्ची की परवरिश के साथ जैसे-जैसे समय मिलता, मैं परीक्षा की तैयारी करती थी। आखिर मैंने RPSC की परीक्षा उत्तीर्ण की और एक अध्यापिका का पद प्राप्त किया। अब मैंने एक परीक्षा तो उत्तीर्ण कर ली थी। किन्तु जीवन अभी अपने कई रहस्य छिपाए हुए था, मेरी कई और परीक्षाएँ अभी बाकी थी।

समय बीतता गया मेरी बच्ची अब 12 वर्ष की हो चुकी थी। जीवन बड़ा ही सुखद महसूस होता था क्योंकि मैं मातृत्व का अपार सुख महसूस कर रही थी। इसी बीच मेरी मुलाकात एक ऐसे शख्स से हुई जिनके अत्यंत सहानुभूतिपर्ण व प्रेम पूर्वक व्यवहार ने मुझे अत्यन्त प्रभावित किया।

इत्तिफाक यह था कि वे भी मेरी तरह एकाकी थे। उन्होने मेरी बच्ची को सहर्ष स्वीकार कर उसकी शिक्षा-दीक्षा व कन्यादान का आश्वासन दिया। उनके इन्ही विचारों से मैं उनके नजदीक आती गई और हम विवाह के बंधन में बंध गए। यह सब मेरे लिए एक नये जीवन जैसा था।

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किन्तु यहां भी विवाह के 2-4 दिन बाद ही उनका मूल स्वभाव मेरे सामने आने लगा। उनका व्यवहार हमारे लिए, विशेषकर मेरी बच्ची के प्रति अत्यंत संकुचित मानसिकता लिये हुए, कठोर, मारपीट वाला हो गया था। यह परिस्थितियां मुझे गहन तनाव की ओर ले गई। इसी दौरान मैं एक बेटे की माँ बनी किन्तु यह खुशी मैं इतनी गहराई से महसूस नही कर पाई। करती भी कैसे? जहाँ मेरी एक संतान को इतना प्रताडि़त किया जाता था, वहीं उस खुशी के लिए मेरा हृदय कभी तैयार कैसे हो पाता? पति के इस व्यवहार से जो चोट मुझे लगी वह कभी हमारे रिश्ते को मजबूत नहीं कर पाई। हर दिन इनके बदलते व्यवहार से अब मुझे यह पता चल चुका था कि इन्हे केवल एक सन्तान की आवश्यकता थी जो कि मृत्यु के पश्चात मुखाग्नि दे सके। जीवन भर जो कमाया उसका वारिस हो सके। मुझे और मेरी बच्ची को एक साधन के रूप में उपयोग किया गया जो सेवा भी करे और वारिस भी दें। इन सब में मेरी बच्ची यूं ही सजा भुगत रही थी। कहते हैं न, अत्याधिक हवा का दबाव पड़ने पर गुब्बारा फट जाता है और हवा-हवा में मिल जाती है। ऐसा ही कुछ मेरे साथ भी हुआ और मैं विद्रोह से भर गई।

अब मैंने मेरी बेटी के साथ होने वाले दुःव्यवहार, मार-पीट आदि का विरोध प्रारम्भ कर दिया। न जाने इतनी हिम्मत मुझमें कहा से आ गयी। मैंने सोच लिया कि अब किसी प्रकार का कोई अन्याय मुझे नहीं सहना है, क्यों सहूँ? इनके घर में रहने की यह बहुत बड़ी कीमत थी जो मैं अब नहीं चुका सकती थी, आखिरकार मैंने अपनी माँ के साथ रहकर अपना और अपने दोनों बच्चों का लालन-पालन स्वयं अपनी कमाई से शुरू किया। इसी बीच मेरे यूट्रस में कुछ तकलीफ होने लगी, बहुत ज्यादा दर्द और ब्लीडिंग बहुत बढ़ गयी थी। पाँच वर्ष मैं इस भयंकर परेशानी को झेलते हुए मैं अपने घर के, बाहर के, नौकरी के सभी काम कर रही थी। इस बीच मेरी इस तकलीफ को समझने वाला कोई नहीं था। फिर मैंने स्वयं ही और पति से कहा कि मुझे डाॅक्टर को दिखाना है वे तैयार हो गये और मैं उनके साथ डाॅक्टर के पास गयी लेकिन मेरे पति से मुझे ना ही आर्थिक और ना ही कोई मानसिक सांत्वना मिली। डाॅक्टर ने आॅपरेशन के लिए कहा और मैंने आॅपरेशन करवा लिया। मेरे भाई के लड़के ने इस आॅपरेशन का सारा काम किया, खर्च मैंने ही उठाया। अपने पति से किसी प्रकार का कोई सहारा नहीं मिलने पर मैं और अधिक मज़बूत हो गयी। एक वर्ष बाद बेटी का घुटने का आॅपरेशन हुआ अब मैं उसके साथ थी, मुझे किसी की आवश्यकता नहीं थी। फिर भी मैं उन सभी लोगों को धन्यवाद देती हूँ जिन्होने किसी भी रूप में मेरी मदद की।

भगवान भी पता नहीं किस-किस प्रकार से मनुष्य की परीक्षा लेते हैं। दुःखों के इस दौर में एक और पीड़ा शामिल हुई और मेरे स्तन में एक गाँठ हो गयी थी जिसकी मैंने लगभग 5 वर्ष पूर्व जाँच करवाई थी, वह गाँठ नाॅर्मल (बेनाईन) थी। डाॅक्टर ने इसे आॅपरेशन द्वारा निकलवाने की सलाह दी। यहाँ मैं एक भारी गलती कर बैठी और इस आॅपरेशन को अपनी जिम्मेदारीयों के चलते नहीं करवा पायी। उन जिम्मेदारियोें में मानसिक रूप से विक्षित मेरा छोटा भाई, मेरी माँ, दो बच्चे और मेरी नौकरी शामिल थे। लगभग 4 साल बाद मेरे स्तन में कुछ दर्द महसूस होने लगा। पूरा शरीर ही दर्द करता था। अब की बार मैंने फिर से डाॅक्टर को दिखाया और जाँच में कैंसर प्रमाणित हो गया। बहुत बड़ा धक्का लगा मुझे। सबसे पहले अपने बच्चों का ख्याल आया कि इनके लिये मुझे इस रोग से लड़ना ही है। यह बात मैंने अपने पति को बताई लेकिन उनकी किसी प्रकार की कोई प्रतिक्रिया नहीं थी। अगले दिन भी और उससे अगले दिन भी, उन्हें शायद डर था कि कहीं उन पर ही यह जिम्मेदारी न आ जाए।

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मैं समझ गई थी कि यह लड़ाई भी मुझे अकेले ही लड़नी होगी मैंने तुरन्त अपने भतीजे को दिल्ली से बुलाया, आॅपरेशन की तारीख पक्की की और जाकर महावीर कैंसर हाॅस्पिटल में भर्ती हुई। इस समय मेरा भतीजा मेरे साथ था। तय की गयी तारीख 4 अप्रेल 2013 को मेरा आॅपरेशन हुआ। आॅपरेशन से पहले O.T. के बाहर मैं केवल ईश्वर को याद कर रही थी। क्योंकि वे ही सबके साथ हमेशा रहते है। मेरे अंदर कोई घबराहट, डर कुछ भी नहीं था अति सामान्य सी मन की स्थिति थी। मैं अपनी बारी का इन्तजार कर रही थी। मुझे मालूम था कि मैं ठीक हो जाऊँगी और मुझे तो ठीक होना ही है। मेरी बारी आई ड्रिप लगाई जा रही थी साथ ही एनेस्थिसिया का मास्क मुँह और नाक पर लगा दिया और मैं प्रभु का ध्यान करते हुए न जाने किन क्षणों में बेहोश हो गयी। जब मुझे होश आया तो डाॅक्टर मुझसे मेरा नाम पूछ रहे थे और मैं I.C.U.  में थी। सभी पहचान वाले और रिश्तेदार मुझसे मिलने आ रहे थे। मैं सामान्य थी मुझे नहीं लग रहा था कि मेरे साथ कुछ भी हुआ है। मेरे पति भी मुझे देखने आए उन्हे देखकर मुझे हाॅस्पिटल जाने से पहले कहे हुए शब्द याद आए ‘‘माधव को आखिरी बार गोदी में उठा कर प्यार करलो बाद में तुम ये सब नहीं कर पाओगी।’’ इस बात का मुझे थोड़ा दुखः अवश्य था लेकिन मुझे उम्मीद थी कि मैं वापस एक सामान्य जीवन जीने लंगूंगी। पाँच दिन बाद मैं हाॅस्पिटल से घर आ गयी।

आॅपरेशन की जगह दर्द था इसलिए सो नहीं पाती थी। गंदे पानी और खून के लिये डेªन लगा हुआ था। घर आने पर तीसरे ही दिन मैंने अपने बच्चे माधव को सुबह तैयार करके स्कूल भेजना शुरू कर दिया। बीस दिन बाद मेरी पहली कीमो थेरेपी हुई। बस इसके बाद ही दर्दनाक दौर शुरू हुआ। थेरेपी से पहले मैं अपने और बच्चे से सम्बन्धित सभी काम कर रही थी। लेकिन मुझे पता नहीं था कि थेरेपी के बाद इतनी अधिक कमजोरी आ जाएगी। मेरा कुछ भी खाने का दिल नहीं करता था हर समय हर खाने की वस्तु में एक अलग ही गंदी सी गंध आती थी, बाल उड़ गये, त्वचा काली पड़ गई, नींद नहीं आती थी। इन सबके बावजूद मैं अपने बच्चे को स्कूल समय पर भेज रही थी। सुबह जल्दी ही बिस्तर छोड़ कर उसका सारा काम करके उसे स्कूल भेज देती थी। और कुछ करने लायक मैं नहीं थी। मैं उन सभी का हृदय से धन्यवाद करती हूँ जिन्होने इस कठिन समय में मुझे सहयोग किया। उनमें मेरी भाभी, भतीजे व भतीजी शामिल है। धीरे-धीरे वक्त गुजरा, कीमोथैरिपी समाप्त हुई और मैं वापस से सामान्य जीवन जीने लगी और अब कैंसर पर विजय मिल चुकी थी।

आखिर में मैं उन सभी को जो कैन्सर जैसी बीमारी से जूझ रहे है यह कहना चाहूँगी कि अगर आप में जीने की इच्छा दृढ़ है और आपके पास कोई एक भी कारण है जो आपकों जीवित रहनें को प्रेरित करता है तो फिर कोई कैंसर आपको हरा नहीं सकता। हमारी जीवन शक्ति में चमत्कारी ताकत है।

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